नई दिल्ली: छठ का महापर्व आज, संतानोत्पत्ति व दीर्घायु के लिए होती है छठ माता की पूजा

👤Special Story By B.K. Dwivedi

नई दिल्ली: कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला यह छठ पर्व संतानोत्पत्ति व उनके सुरक्षा अर्थात दीर्घायु के लिए मनाया जाता है। मान्यता के मुताबिक छठ देवी सूर्य देव की बहन है और उन को खुश करने के लिए सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए इन्हे साक्षी मानकर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखरी के किनारे यह पूजा किया जाता है। छठ माता को बच्चों की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। 

इस व्रत को करने से संतान को लंबी आयु का वरदान मिलता है। मार्कंडेय पुराण में इस बात का जिक्र है कि सृष्टि अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को 6 भागों में विभाजित किया है। इन के छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जाना जाता है जो ब्राह्मा की मानस पुत्री हैं। कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को इस देवी की पूजा की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार प्रियंबद नामक एक राजा थे। जिनकी कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए राजा ने यज्ञ करवाया। यह यज्ञ महर्षि कश्यप ने संपन्न कराया और यज्ञ करने के बाद महर्षि ने प्रियंबद की पत्नी मालिनी को आहूत के लिए बनाई गई खीर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने के लिए दी।

खीर खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई लेकिन उनका पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। यह देख राजा बेहद व्याकुल और दुखी हुए। अपने मरे हुए पुत्र को लेकर राजा शमशान गए और पुत्र वियोग में अपने प्राण त्यागने लगे इसी समय ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुई। उसने राजा से कहा कि वह उनकी पूजा करें। यह भी श्रेष्ठ की मूल प्रवृत्ति की छठी अंश से उत्पन्न हुई है। यही कारण है कि यह छठी मैया कही जाती है।

जैसा माता ने कहा था ठीक वैसे ही राजा ने पुतृ की कामना से देवी का व्रत किया। यह व्रत करने से राजा को पुत्र की प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि छठ पूजा संतान प्राप्ति और संतान की सुखी जीवन के लिए किया जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। महाभारत काल में सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। कुछ कथाओं में पांडव की पत्नी द्रोपदी भी सूर्य की पूजा की थी।


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