महराजगंज: आग में झुलसने से मासूम बच्चे की मौत, माँ का रो-रो कर बुरा हाल, मचा कोहराम

महराजगंज: विधि के विधान को कोई बदल नहीं सकता। इस पंक्ति के सुनने व पढ़ने वाले को तो संतुष्टि मिल जाती है। लेकिन जिस पर बीती होगी उसका क्या हाल होगा, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
इसी प्रकार विधि के विधान ने इस कदर करवट बदला कि मां के गर्भ से निकलकर जमीन पर धरती मां की  गोद में हमेशा के लिए समा गया। 

मामला बृजमनगंज थाना क्षेत्र के सिकंदरा जीतपुर गांव की है। जहां एक झोपड़ी में अचानक आग लग गई। सारा सामान जलकर खाक हो गया। वहां के निवासी श्यामदेव यादव जो ईट भट्टे पर कार्य करता था अपनी रोजमर्रा के लिए चला गया। बेचारी पत्नी भी किसी काम के लिए खेत चली गई थी। आग लगने के समय उसका चार माह का बच्चा विष्णु लपटों में बुरी तरह झुलस गया। ग्रामीणों के काफी मशक्कत के बाद उस मासूम को गंभीर अवस्था में निकाल कर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र धानी ले जाया गया। जहां हालत की गंभीरता देख डॉक्टरों ने मेडिकल कॉलेज गोरखपुर के लिए रेफर कर दिया। मेडिकल कॉलेज पहुंचते ही मासूम इस दुनिया को अलविदा कह कह गया। घटना की सूचना मिलते ही नगर पंचायत अध्यक्ष राजेश जायसवाल, योगेंद्र त्रिपाठी, उमेश त्रिपाठी, गुलाब चौरसिया मौके पर पहुंचकर परिजनों को ढाढस बढ़ाये।

चार माह में ही मां की गोद को कर दिया सुना
उस माता पर क्या बीता होगा जो नौ माह तक गर्भ धारण कर अपने भविष्य के कर्णधार को चार माह अपनी गोद में देख हमेशा के लिए अलविदा कह गया। उस दूधमुहे बच्चे से मां ने इतनी तमन्ना रखी होगी जो बताने लायक नही है। प्रसव पीड़ा के बाद जब आंखों के सामने बच्चा देखी होगी तो कितनी खुशी हुई होगी। शायद उसे नहीं मालूम रहा होगा कि उसकी यह खुशी महज चंद दिनों की ही है। उसके बाद ऐसा गम मिलेगा जो पूरे जीवन नहीं भुला पाएगा। शायद वह ऐसा कुछ जानी होती तो मासूम को अपनी गोद में चिपका कर खेत गई होती लेकिन विधि के विधान को कोई बदल नहीं सकता। घटना के बाद उसके आंखों से अनवरत हो रहे अश्रु बरसा को रोक पाना मुश्किल सा होता जा रहा था। ढाढस देने वाले मां की ममता को देखकर स्वयं सुसुकने लगते थे।

कंधे पर आए बिना अलविदा कह गया जिगर का टुकड़ा
प्राय यह देखा जाता है कि पिता अपने छोटे से बच्चों को कंधे पर बिठाकर घूमाते रहते हैं। लेकिन इस अभागे को क्या मालूम कि उसका बच्चा मां की गोद से उसके कंधे तक आने के पहले ही हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह जाएगा। उसके कंधे अपने बच्चे के लिए हमेशा के लिए सुना ना हो जाए। यदि ऐसा मालूम हुआ होता तो शायद वह ईट भट्टे पर काम पर नहीं गया होता। काम पर जाता नहीं तो फिर पेट की ज्वाला शांत कैसे होती। भूख की जवाला मिटाने के लिए एक काम पर जाना मजबूरी थी।


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